सर्व शक्तिमते परमात्मने श्री रामाय नमः

स्वामी सत्यानंद जी महाराज १९वीं सदी के एक शांत,सिद्ध उच्च कोटि के महान संत थे. एक सच्चे अनुभवी, पहुंचे हुए पूरे सतगुरु एवं महान योगी थे.

पूज्य पाद एक विलक्षण एवं अद्वितीय प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व के धनि थे, जिनका सानिध्य व संपर्क प्राप्त कर हम धन्य हुए है और परम सौभाग्यशाली बने हैं.

श्री स्वामीजी द्वारा प्रदत्त नाम दीक्षा एक रहस्यवाद है, जिसमें स्वामीजी अपनी संकल्प शक्ति से साधक के अंत कारण में राम नाम एक जाग्रत चैतन्य मन्त्र को स्थापित करते हैं. जिस प्रकार बीजारोपण एक विशेष प्रकार से तैयार हुई भूमि में किया जाता है और उसके उपरांत जब देखभाल की जाती है तभी वह अंकुरित होता है और कालान्तर में वृक्ष बनता है. इसी प्रकार श्री स्वामीजी के अनुसार गुरु मार्ग दिखानेवाला होता है, उसका कार्य बीज बोना है.साधक का कर्त्तव्य है, सुद्रिड निश्चय के साथ सतत साधना रत रहना, किन्तु जिस प्रकार अच्चा बीज उल्टा सीधा कैसा भी भूमि में डाल दिया जाये अवश्यमेव अंकुरित होता है. उसी प्रकार सिद्ध जागृत संतो से मिला नाम(मंत्र) अवश्य ही अपना रंग दिखता है. साधक के आचार विचार व व्यवहार के परिवर्तन से इसकी अनुभूति की जा सकती है.

श्री स्वामीजी १३ नवम्बर १९६० को भौतिक चोला छोड परम धाम सिधार गए.

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राम शरणम्

श्री राम शरणम् का अंतिम उद्देश्य संक्षेप में और स्पष्ट रूप से इसमें अभिव्यक्त किया गया है:

  • वृद्धि आस्तिक भाव की, शुभ मंगल संचार
  • अभेउ उड़ाई साद धरम का, राम नाम विस्तार.